त्रिपुरा और चटगांव में जो चकमा शरणार्थी रह रहे हैं, वे अपने अनिश्चित भविष्य से घबराए हुए हैं। त्रिपुरा, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में चकमाओं का संकट हल होने के बजाय और बढ़ गया। त्रिपुरा में बने शरणार्थी शिविरों में रहने वाले शरणार्थियों की संख्या 56 हजार है। त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री सुधीर रंजन मजूमदार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि चकमा आदिवासियों के भरण-पोषण का खर्च उठाना उनके आर्थिक बूते के बाहर की बात है। वर्तमान मुख्यमंत्री दशरथ देव ने भी केंद्र सरकार से और बंगलादेश सरकार दोनों से आग्रह किया है कि चकमाओं की स्वदेश वापसी की तत्काल व्यवस्था करें, क्योंकि उन्हें अपने राज्य की जनता का विकास और कल्याण कार्यों की योजना बनाने का खर्च काटकर चकमा शरणार्थियों के लिए अन्न और पानी की व्यवस्था करनी पड़ रही है। इन शिविरों में रह रहे शरणार्थियों के नेता उपेंद्र लाल चकमा और ब्रह्मनारायण चकमा का कहना है कि भारत सरकार बंगलादेश पर चटगांव में पुलिस व सेना का आतंकराज समाप्त करके अनुकूल माहौल पैदा करने के लिए दबाव डाले, ताकि चकमा लोग अपनी जमीन पर लौटकर शांति की जिंदगी गुजार सकें।

हुआ यूं कि इस महीने के प्रथम सप्ताह में ढाका के चटगांव पहाड़ी क्षेत्र के रंगामाटी जिले में चकमा आदिवासियों के अधिकारों के लिए पिछले 20 वर्षों से संघर्षरत शांतिवाहिनी छापामारों ने एक ही रात में जबरदस्त हमले में 30 सुरक्षाकर्मियों की हत्या करके दिखा दिया कि बंगलादेश की सरकार भले ही उनकी ओर से आंखें मूंद ले, पर वे अपना हक हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। ढाका से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना उस गांव के दौरे पर गईं, सुरक्षाकर्मियों के परिवारों को सांत्वना दी और कहा कि आदिवासियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर बातचीत के जरिए समस्या का हल निकालना चाहिए। ढाका लौटकर उन्होंने चकमा प्रतिनिधियों या शांतिवाहिनी के नेताओं को बातचीत के लिए बुलावा भेजने की जरूरत नहीं समझी, उल्टे पूरे चटगांव जिले में सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ाकर उन्हें किसी भी परिस्थिति में कड़ाई से निपटने के निर्देश दे दिए गए।

शेख हसीना ने यह भी कहा कि भारत में रह रहे चकमा शरणार्थियों की वापसी के लिए वह भारत सरकार से अधिकारी स्तर पर शीघ्र ही बातचीत करेंगी, लेकिन उससे चकमाओं के इलाकों का माहौल फिर से तनावपूर्ण हो गया। हालांकि, अभी तक दोनों देशों की सरकारों के बीच कोई गंभीरता से विचार-विमर्श संभव नहीं हो पा रहा है, जिनमें सिर्फ दक्षिण त्रिपुरा के शरणार्थी शिविर शामिल हैं।

इस हत्याकांड के दौरान ही शांतिवाहिनी ने एलान कर दिया था कि अगर चकमाओं के साथ सरकार का रवैया नहीं बदला, तो चटगांव में एक भी सुरक्षा जवान जिंदा अपने घर नहीं लौट सकेगा। चकमा आदिवासियों के नेता अपने भाई-बंधुओं की बदनीयती के लिए बंगलादेश की सरकार को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि बंगलादेश की अभी तक की सरकार चटगांव पहाड़ी क्षेत्र की अशांति के लिए भारत पर दोषारोपण करती रही है।

यदि चकमा शरणार्थियों की सम्मानजनक स्वदेश वापसी की कोशिश नहीं की गई, तो उसका खामियाजा शिविरों में रह रहे निर्दोष चकमाओं को भुगतना पड़ेगा और वे बद से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हो जाएंगे। शांतिवाहिनी तो हमला करके अथवा पुलिस द्वारा धावा बोले जाने का जवाब देकर भूमिगत हो जाते हैं, और पुलिस उसके बाद छापामारों को खोजने के लिए लाचार ग्रामीणों को यातनाएं देती है तथा बेकसूरों को पकड़कर उनके साथ बदसलूकी करती है।

त्रिपुरा सरकार ने अपनी बंगलादेश से लगने वाली सीमा को कंटीले बाड़ से घेरकर अब शरणार्थियों के प्रवेश पर कड़ी पाबंदी लगा दी है। ध्यान ही नहीं दिया गया कि 1993 में त्रिपुरा सरकार द्वारा हायतौबा मचाने के बाद बेगम जिया ने रुचि तो दिखाई, लेकिन उससे स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। पहले तो दोनों देशों के विदेश मंत्रियों और त्रिपुरा तथा चटगांव के सुरक्षा प्रमुखों के बीच बड़े ही नाटकीय ढंग से विचार-विमर्श का सिलसिला चला। आखिरकार बेगम खालिदा ने सीमित संख्या में चकमा आदिवासियों को वापस लेना स्वीकार किया, लेकिन यह व्यवस्था करने की जरूरत नहीं समझी कि चकमा लोग जब स्वदेश लौटेंगे, तो रहेंगे कहां और खाएंगे क्या।

क्योंकि, चकमाओं को अपनी जगह-जमीन से जबरदस्ती बेदखल करके उन्हें देश छोड़ने को मजबूर कर दिया गया था। शरणार्थियों को जब सम्मानपूर्वक स्वदेश वापसी की व्यवस्था की गई और जब उन लोगों ने अपने देश की सीमा में कदम रखा, तो पाया कि उनका गांव पराया हो चुका है। चटगांव और उसके आस-पास बस गए मुसलमानों ने न केवल उन्हें पहाड़ों, जंगलों व नदी किनारे खुले आकाश के नीचे रहने को मजबूर कर दिया, बल्कि कइयों को दुत्कार कर भगा भी दिया।

कुछ तो दुखी होकर भारत की सीमा में लौट आए और सीमा पर तैनात भारतीय सुरक्षा कर्मियों की नाव किनारे लगने से पहले ही वे रो-रोकर कहने लगे कि उन्हें बीच नदी में डुबो दें, गोली मार दें, पर बंगलादेश न भेजें। बहुतों ने मुस्लिम बहुसंख्यकों की दुत्कार और गाली-गलौज सुनकर ही सही, चटगांव में ही रहना मंजूर कर लिया।

उपेंद्र लाल चकमा ने इस दोमुंही नीति की ओर भारत सरकार का ध्यान आकर्षित किया और केंद्र ने चकमाओं को जबरदस्ती स्वदेश भेजे जाने पर रोक लगा दी। फिर त्रिपुरा सरकार द्वारा सीमा को सील कर दिए जाने के बाद से चकमा अधिकारियों के बीच विचार-विमर्श का सिलसिला अधर में अटक गया है। एक जगह समूह में कुटुंब की तरह रहने के आदी चकमा परिवारों का ढांचा छिन्न-भिन्न होकर रह गया। कई परिवारों के आधे सदस्य बंगलादेश में हैं तो आधे भारत में। त्रिपुरा में रह रहे शरणार्थियों का भविष्य अनिश्चितता के घेरे में है।

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का पिछला शासनकाल अभूतपूर्व संवैधानिक संकट के दौर से गुजरा, इसलिए उन्होंने चकमा समस्या की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया; फिर चकमा शरणार्थियों के लिए उनके दिल में कोई विशेष जगह नहीं थी।

स्वभाव से मेहनती और कट्टर बौद्ध मतावलंबी चकमा आदिवासियों को इस्लामी रीति-रिवाज अपनाने को मजबूर करने के लिए उनके साथ अमानवीय अत्याचारों का सिलसिला वास्तव में बंगलादेश के प्रथम राष्ट्रपति बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान ने ही शुरू किया था। 1972 से चकमा लोग अपनी इज्जत-आबरू बचाने के लिए भारत की शरण में आने लगे। बंगलादेशी पुलिस व सेना ने दर्जनों बौद्ध मठ तोड़ दिए, सैकड़ों मकानों में रातों में आग लगाकर चकमाओं को जिंदा जला दिया और जो बाहर निकले, उन्हें गोली मार दी गई तथा महिलाओं के साथ दुराचार किया गया। यह काम नियोजित ढंग से पुलिस व सेना के सहयोग से मुस्लिमों को बसाने के लिए किया गया।

इस साजिश को कामयाब करने में बेगम खालिदा से पहले बंगलादेश के शासक ले. जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने ही मुख्य भूमिका निभाई, जो फिलहाल भ्रष्टाचार के जुर्म में जेल में हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक अब तक पांच हजार से ज्यादा चकमा मारे जा चुके हैं। फिर, 1976 में उनमें एक विद्रोही गुट पैदा हो गया जिसने 'शांतिवाहिनी' के नाम से जांबाजों का एक दस्ता बनाया और बंगलादेश की सेना व पुलिस से अपने अपमान का बदला लेना शुरू किया। इस अभियान को भी कई वर्ष हो गए, पर शांतिवाहिनी को आशातीत सफलता नहीं मिल रही है। उनके हमले और जवाबी हमले से लगातार खून-खराबे का माहौल बना रहता है।