बंगलादेश में १५ फरवरी को संपन्न आम चुनाव के बाद बनी बेगम खालिदा जिया की सरकार एक दिन भी कायदे से शासन नहीं चला पाई और अभूतपूर्व राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन के आगे झुकना पड़ा। स्थिति तब तक शांत नहीं हो पाई जब तक कि बेगम जिया ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे दिया।
दरअसल यह आम चुनाव था ही कुछ अजीब तरह का, जिसमें पूरे देश में सिर्फ सत्तारूढ़ बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के ही उम्मीदवार खड़े थे, क्योंकि सभी विपक्षी दलों ने चुनाव का बहिष्कार किया था। बहिष्कार का फैसला कोई चुनाव नजदीक आने के समय किया गया, ऐसी बात नहीं थी। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अवामी लीग की अध्यक्षा शेख हसीना वाजेद के नेतृत्व में सभी विपक्षी नेताओं ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया और मांग की कि चुनाव की घोषणा से पहले बेगम जिया अपने पद से इस्तीफा देकर सत्ता एक कामचलाऊ तटस्थ सरकार के हाथ में सौंप दें, जिसकी देखरेख में चुनाव हों।
विपक्षियों का कहना था कि बेगम खालिदा जिया के सत्ता में रहते निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है, क्योंकि अगर उन्होंने चुनाव कराया तो यह १९९१ जैसा ही होगा जिसमें जमकर धांधली की गई। उसी समय शेख हसीना ने जबर्दस्त तरीके से मांग रखी कि या तो बेगम जिया इस्तीफा देकर नया जनादेश हासिल करें अन्यथा विपक्ष सरकार का कोई कामकाज नहीं चलने देगा। लेकिन बेगम जिया ने विपक्ष की मांग अनसुनी कर दी और अपना कार्यकाल पूरा किया; यह अलग बात है कि पांच साल तक सत्ता की कुर्सी उनके लिए कांटों का ताज बनी रही।
### एकतरफा चुनाव और सरकार का पतन
शेख हसीना ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि बेगम जिया ने अगर बिना इस्तीफा दिए चुनाव कराया तो विपक्षी दल चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे और वही हुआ। बेगम जिया प्रधानमंत्री पद पर डटी रहीं और किसी भी विपक्षी पार्टी ने अपना एक भी उम्मीदवार खड़ा नहीं किया। ऐसे माहौल में हुए चुनाव में सत्तारूढ़ दल के जितने उम्मीदवार मैदान में थे, किसी के हारने का सवाल ही नहीं उठता था, जबकि मतदान का प्रतिशत बहुत कम रहा।
लेकिन यह जीत सत्तारूढ़ पार्टी को काफी महंगी पड़ी। चुनाव के दिन से ही विपक्षी पार्टियों ने पूरे देश में हंगामे का माहौल खड़ा कर दिया। वैसे हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, तालेबंदी वगैरह तो साल भर पहले से जारी थी, लेकिन बेगम जिया के दोबारा सत्ता में आने के विरोध में १३ लाख से भी ज्यादा सरकारी कर्मचारी सड़कों पर उतर आए और पुलिस तथा सेना के अफसरों ने भी संकेत दे दिया कि अगर अस्त-व्यस्तता का यह दस्तूर जारी रहा तो वे मूक दर्शक बने नहीं रहेंगे।
### तीन महीने में दूसरे चुनाव की घोषणा
अब १२ जून को एक बार फिर से मतदान कराने की घोषणा हो चुकी है, क्योंकि ३० मार्च को संसद भंग कर दी गई और बंगलादेशी संविधान के मुताबिक संसद भंग होने के ९० दिन के अंदर आम चुनाव होने चाहिए। लेकिन जिन लोगों पर आम चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनके बारे में पहले से ही इतने तरह के आरोप सामने आ रहे हैं कि तीन महीने के अंदर होने वाले दूसरे चुनाव की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
मुख्य सलाहकार हबीबुर्रहमान को बड़ी कठिन जिम्मेदारी निभानी है क्योंकि कुछ विचित्र माहौल में चुनाव कराकर उन्हें चुनकर आई बहुमत वाली पार्टी के हाथ में सत्ता सौंपनी है। बंगलादेश के इतिहास की यह पहली घटना है। १५ फरवरी का चुनाव देश का दूसरा आम चुनाव था जिसके बाद बनी संसद मात्र १२ दिन अस्तित्व में रही जिसमें इसकी मात्र पांच बैठकें हो पाईं। १९ मार्च को इस संसद की पहली बैठक बुलाई गई और ३० मार्च को भंग कर दी गई।
बेगम जिया ने प्रधानमंत्री पद पर बने रहते हुए यह कहकर चुनाव कराया था कि संवैधानिक संकट से देश को उबारने के लिए यही एक रास्ता है, क्योंकि विपक्षी दल राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनाए रखना चाहते हैं जबकि वर्तमान संसद का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि वे जनता को आश्वस्त कर लेंगी, लेकिन मतदान के प्रति उदासीनता और फिर पूरे मार्च भर विपक्षी दलों के व्यापक आंदोलन चलाने में मिले जनसाधारण से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक के सहयोग ने उनका मोहभंग कर दिया और उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा। इस संसद का एकमात्र महत्वपूर्ण काम कामचलाऊ सरकार बनाने संबंधी विधेयक पारित किया जाना रहा।
### संवैधानिक संकट की पृष्ठभूमि
वास्तव में संवैधानिक संकट के दौर से बंगलादेश पूरे दो साल से गुजर रहा है, जिसकी तैयारी विपक्षी दलों ने उसी समय से शुरू कर दी थी जब १९९१ के आम चुनाव के बाद खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं। शुरुआत संसद के बहिष्कार से हुई और बिल्कुल सुनियोजित ढंग से विपक्ष के १४७ सांसदों ने संसद की सदस्यता से अपना सामूहिक इस्तीफा अध्यक्ष शेख रज्जाक अली को सौंप दिया (फरवरी, १९९५)। अध्यक्ष ने उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया और सांसदों से बार-बार आग्रह किया कि वे संसद की बैठक में शामिल हों। लेकिन विपक्षी संसद सदस्यों को न तो संसद की कार्यवाही में सम्मिलित होना था और न वे हुए। उसी समय से संवैधानिक संकट की शुरुआत होती है।
बेगम खालिदा जिया ने कई बार विपक्षी नेताओं को आपसी बातचीत के जरिए इस संवैधानिक संकट का हल निकालने के लिए आमंत्रित किया। वे इस्तीफे की मांग तो मानने को तैयार थीं, लेकिन उनका कहना था कि आम चुनाव से मात्र ३० दिन पूर्व इस्तीफा देंगी, जबकि विपक्ष अपनी इस मांग से जरा भी तब्दीली करने को राजी नहीं था कि बेगम जिया अपने पद से चुनाव से ९० दिन पूर्व हट जाएं और अड़ा रहा कि उनसे कोई भी बातचीत इस्तीफे के बाद ही हो सकती है। शेख रज्जाक अली और बेगम खालिदा जिया को देश की लुंज-पुंज अर्थव्यवस्था की भी चिंता थी, इसलिए इतनी ज्यादा सीटों के लिए उपचुनाव की घोषणा करके वे जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती थीं।
जनता का रुख उनके अनुकूल नहीं है, इसके प्रति बेगम जिया सचेत तो थीं ही। आखिर पूरे तीन साल तक देश के तमाम कल-कारखानों और उद्योग-धंधों में लगातार सफलतापूर्वक हड़ताल व तालेबंदी कराने में विपक्ष को जनता के सहयोग से ही सहूलियत हुई। देश विदेशी कर्ज में डूबता चला गया और उसी माहौल में बी.एन.पी. सरकार ने चुनाव कराने की घोषणा कर दी जिसका पटाक्षेप उसके इस्तीफे से हुआ।
### कामचलाऊ सरकार और निष्पक्षता पर सवाल
वह चुनाव एक कामचलाऊ सरकार की देखरेख में कराए गए थे। उस सरकार का नेतृत्व बंगलादेशी सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश शहाबुद्दीन अहमद कर रहे थे, जिन पर बेगम खालिदा जिया की तरफदारी करने के आरोप लगे थे। ३० मार्च को बेगम जिया के इस्तीफे के बाद बनी कामचलाऊ सरकार के मुख्य सलाहकार के रूप में शपथ लेने वाले हबीबुर्रहमान भी मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं।
यह व्यवस्था कामचलाऊ सरकार की तटस्थता बनाए रखने के लिए की गई, लेकिन इसकी तटस्थता पर शुरुआत से ही उंगलियां उठने लगी हैं। राष्ट्रपति अब्दुर्रहमान के विश्वास पर अमूमन सभी पार्टियों के नेताओं ने कामचलाऊ सरकार को बेगम खालिदा जिया के पक्ष में प्रभावित करने के आरोप लगाए हैं। शेख हसीना वाजेद पहले से कहती रही हैं कि बेगम खालिदा जिया को इतने भारी विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री पद पर बनाए रखने में राष्ट्रपति का हाथ है।
अवामी लीग ने चुनाव आयोग के पुनर्गठन की भी मांग की थी। नई कामचलाऊ सरकार ने उनकी मांग मानकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा दिया और उनकी जगह अबुहेना को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया। इस पर तो कोई टिप्पणी नहीं हुई, लेकिन बाकी दो आयुक्तों के बारे में आरोप है कि वे बेगम जिया के कहने से रखे गए हैं। विपक्ष बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की मांग कर रहा था। अवामी लीग ने कामचलाऊ सरकार के सलाहकारों की नियुक्ति में भी बेगम जिया द्वारा सशक्त भूमिका निभाने की बात कही है।
### भारत विरोधी रुख का चुनावी मुद्दा
भारत विरोधी रुख अपनाना अन्य पड़ोसी देशों की तरह बंगलादेश की भी एक खासियत है। बेगम जिया अपनी चुनावी सभा में भारत के साथ हुई २५ साला मैत्री संधि को भारत के सामने घुटने टेकने के समान बताती हैं और सत्ता में आने के बाद इसे खत्म करने का वायदा कर रही हैं। उन्होंने शेख हसीना पर इस संधि की अवधि बढ़ाने की कोशिश का आरोप लगाया है।