भारत को अपने पड़ोसी देशों की नजर लग गई प्रतीत होती है। जब भारत में राजनीतिक स्थिरता थी, तब पाकिस्तान, नेपाल और बंगलादेश में उथल-पुथल का दौर चल रहा था। यह दौर न खत्म होना था न हुआ, हां भारत अवश्य इसकी चपेट में आ गया। नेपाल में शेर बहादुर देउबा को विश्वास मत हासिल न करने के कारण इस्तीफा देना पड़ा। पाकिस्तान में बेनजीर सरकार को बर्खास्त कर दिया गया और पिछले वर्ष बंगलादेश में भी बेगम खालिदा जिया को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर आम चुनाव कराना पड़ा। पाकिस्तान में फिलहाल उम्मीद की जा सकती है कि नवाज शरीफ अपना कार्यकाल पूरा कर लेंगे।
### स्थिरता नहीं आई
बंगलादेश में भी गत वर्ष जून में हुए चुनाव के बाद ऐसा लगा कि देश में राजनीतिक स्थिरता आएगी और देश में पांच साल बाद ही सही, अमन-चैन कायम हो जाएगा, पर वैसा हुआ नहीं। बंगलादेश में अब अमूमन वैसी ही परिस्थितियां बनती जा रही हैं जिनके चलते बेगम खालिदा जिया को अपने शासनकाल के दौरान कामकाज के नाम पर कानून और व्यवस्था से जूझते और कुर्सी बचाने की कोशिशों में जुटे रहना पड़ा।
१९९० में बेगम खालिदा जिया लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद को अपदस्थ कर सत्ता हासिल करने में कामयाब हुईं, लेकिन उसके थोड़े दिनों बाद से ही अवामी लीग की अध्यक्षा शेख हसीना वाजेद ने देशव्यापी आन्दोलन छेड़ दिया। शुरुआत उन्होंने बंद, हड़ताल, चक्का जाम, तालेबंदी से की और फिर उतर आईं संसद के बहिष्कार पर। शेख हसीना को अपने अभियान में अन्य छोटे-मोटे विपक्षी दलों का भी सहयोग मिला और अंततः उन्होंने बेगम खालिदा को हटाने में सफलता हासिल की।
अवामी लीग के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या (१९७५) के २१ वर्ष बाद १९९६ में यह पार्टी सत्ता में आई। लेकिन गद्दी शेख हसीना के लिए भी वैसे ही कांटों का ताज साबित हुई है जैसे बेगम खालिदा के लिए थी। जो सिरदर्द बेगम खालिदा का था, वह शेख हसीना के सिर में समा गया और शेख हसीना को भी विकास की योजनाओं पर ध्यान देने की बजाय आए दिन उन संकटों से जूझना पड़ रहा है जो उन्होंने पूर्ववर्ती के लिए खड़े किए थे।
### बीएनपी द्वारा संसद का बहिष्कार और आन्दोलन
बेगम खालिदा जिया की बीएनपी (बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने अपनी मंशा का संकेत २३ जून, १९९६ को ही दे दिया, जब पार्टी सांसदों ने शेख हसीना के शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया। बेगम खालिदा का कहना था कि शेख हसीना का प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण असंवैधानिक है, क्योंकि इन्होंने बहुमत में आने के लिए पहले तो चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली की और फिर भ्रष्टाचार के जुर्म में जेल काट रहे हुसैन मुहम्मद इरशाद की जातीय पार्टी से अपवित्र गठबंधन किया, इसलिए जन-भावनाओं का ख्याल करके उनका ऐसे समारोह में शामिल होना उचित नहीं है।
शेख हसीना ने बेगम खालिदा के सत्तारूढ़ होने के बाद यह जरूर कहा था कि बीएनपी सरकार को इस्तीफा देकर नया जनादेश प्राप्त करना चाहिए। मगर वे शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं और संसद का बहिष्कार भी उस समय किया जब खालिदा शासन का कार्यकाल पूरा होने में सिर्फ एक वर्ष बाकी रह गया था। लेकिन बेगम खालिदा ने एक डिग्री आगे बढ़कर पहले दिन से ही संसद का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है।
शेख हसीना जब विपक्ष में थीं तो उनकी एकमात्र मांग यही थी कि बेगम खालिदा पहले इस्तीफा दें, एक कामचलाऊ सरकार बने जिसके नेतृत्व में चुनाव हो और बेगम खालिदा निश्चित रूप से चुनाव से ९० दिन पूर्व प्रधानमंत्री का पद छोड़ दें क्योंकि उनके सत्ता में होते हुए निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। इसी मांग को लेकर शेख हसीना ने संसद का बहिष्कार किया था। जबकि बेगम खालिदा का कहना था कि वे इस्तीफा देने को तैयार हैं, पर चुनाव से मात्र ३० दिन पूर्व देंगी; लेकिन शर्त यह है कि सभी विपक्षी संसद में लौट आएं। दोनों पक्ष अड़े रहे और आखिरकार मई, १९९६ में बेगम खालिदा ने सत्ता में रहकर ही चुनाव कराए जिसमें विपक्ष ने हिस्सा नहीं लिया। प्रबल विरोध के आगे वे इस्तीफा देने को मजबूर हुईं और न्यायमूर्ति हबीबुर्रहमान के नेतृत्व में कामचलाऊ सरकार बनी जिसने नए चुनाव आयोग का गठन किया और १२ जून को चुनाव सम्पन्न हुआ।
### बेगम खालिदा के आरोप और सरकार की सख्ती
अब बेगम खालिदा, शेख हसीना और चुनाव आयोग पर धांधली का आरोप लगाकर अवामी लीग सरकार को अपदस्थ करने के लिए आन्दोलन चला रही हैं। अभी तक तो छोटे-मोटे प्रदर्शन चल रहे थे, लेकिन २३ मार्च को बीएनपी ने देशव्यापी हड़ताल का आयोजन किया था, पर प्रशासनिक चुस्ती के कारण आंशिक रूप से ही सफलता मिली। २२ मार्च को प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्लामी देशों के सम्मेलन में भाग लेने के लिए इस्लामाबाद प्रस्थान करना था, इसलिए एक दिन पहले ही व्यापक धरपकड़ अभियान चलाया गया।
महासचिव अब्दुल मन्नान भुइयां भूमिगत हो गए। विशेष अधिकार अधिनियम के तहत पकड़े गए नेताओं को ढाका केन्द्रीय जेल में ३० दिनों के लिए हिरासत में भेज दिया गया। शेख हसीना अच्छी तरह जानती थीं कि बीएनपी अवामी लीग को सत्ता से हटाने की कोई कोशिश बाकी नहीं छोड़ेगी, इसलिए विशेष अधिकार अधिनियम संसद से पारित कराकर अवामी लीग ने व्यापक अधिकार हाथ में ले लिए हैं। लेकिन उसके बाद भी शेख हसीना चैन की नींद नहीं सो पा रही हैं और देश में फिर से राजनीतिक अराजकता का माहौल बनता जा रहा है।
इसका सीधा असर देश की पहले से चली आ रही लुंज-पुंज अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है, जो शेख हसीना सत्ता में आने के पूर्व से ही देख रही थीं। बेगम खालिदा ने साफ ऐलान कर दिया कि अवामी लीग सरकार के खिलाफ जनान्दोलन तब तक जारी रहेगा जब तक यह सरकार इस्तीफा नहीं दे देती। जाहिर है कि इस सरकार को भी विदेशी कर्ज में आकंठ डूबे बंगलादेश का ज्यादातर पैसा मुख्य रूप से कुर्सी बचाए रखने के लिए ही खर्च करना होगा, जो यहां की जनता आजादी के बाद से ही देख रही है।
### खालिदा के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले
इस बीच अवामी लीग सरकार ने बेगम खालिदा और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज किए हैं। ढाका से प्रकाशित बंगला अखबार 'संगबाद' के मुताबिक एक भ्रष्टाचार निरोध ब्यूरो की स्थापना की गई है जो इन मामलों की जांच कर रहा है। सबसे पहला मामला है— बीएनपी शासनकाल के दौरान प्रधानमंत्री खालिदा द्वारा ८६ लाख टका अपने छावनी स्थित आवास के पुनर्निर्माण पर विभिन्न विभागों के बड़े अधिकारियों पर दबाव डालकर भारी गोलमाल करने का आरोप। बेगम खालिदा ने इन आरोपों को निराधार और राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताया है।
### राजनीतिक फायदे के लिए भारत विरोधी कार्ड
बंगलादेश में भारत विरोधी भावनाओं का बड़ा विचित्र ढंग से राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है, जिसका ताजा उदाहरण इन दोनों महिला राजनीतिज्ञों ने अपनी सत्ता की लड़ाई के दौरान प्रस्तुत किया। जब बेगम खालिदा जिया सत्ता में थीं तो शेख हसीना उन पर देश की सम्प्रभुता भारत के हाथों गिरवी रखने का आरोप लगाती थीं। वे अपने पिता के शासनकाल में (१९७२) हुई २५ साला मैत्री संधि को भारत के आगे घुटने टेकने वाली संधि कहा करती थीं और अब वही सब बातें शेख हसीना के खिलाफ बेगम खालिदा बोल रही हैं।
खालिदा ने सत्ता के दौरान गंगा जल बंटवारे के सम्बन्ध में हुए समझौते को बंगलादेश का अपमान कहा है। बेगम खालिदा जिया का कहना है कि भारत ने बंगलादेश को गंगाजल का उचित हिस्सा नहीं दिया और देश को ऐसी अपमानजनक स्थिति का सामना पहले कभी नहीं करना पड़ा। उनका आरोप है कि प्रशासनिक कुप्रबंध के चलते देश की आर्थिक बदहाली अपनी पराकाष्ठा पर है।
शेख हसीना ने अपने पिता के हत्यारों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए संसद से विधेयक पारित करवाकर अधिकार हासिल किए और उन सैनिक अधिकारियों पर कार्रवाई की, जिनका हत्या के षड्यंत्र में हाथ था। बेगम खालिदा ने इसका भी विरोध किया है और शेख मुजीबुर्रहमान के बारे में यह प्रचार करना शुरू कर दिया है कि १९७४ में उनके शासनकाल में पड़े भीषण अकाल में २७ हजार लोग मरे, लेकिन वे अपने को ज्यादा से ज्यादा शक्तिशाली बनाने में जुटे रहे।
लेफ्टिनेंट जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद पर से वे सारे मुकदमे उठा लेना बीएनपी नेता को जरा भी अच्छा नहीं लगा, जो उनके शासनकाल में चलाए गए थे। इरशाद की जातीय पार्टी के समर्थन की बदौलत अवामी लीग को बहुमत मिला है और बीएनपी संसद में मजबूत विपक्ष की हैसियत रखती है। इसलिए बीएनपी द्वारा संसद का लगातार बहिष्कार करके सड़क पर उतर जाना अवामी लीग सरकार को महंगा पड़ सकता है।
### आई.एस.आई. की गतिविधियों में कमी
बंगलादेश के अंग्रेजी पत्र 'इंडीपेंडेंट' के एक सम्पादकीय के अनुसार यह बात सही है कि अवामी लीग के सत्ता में आने के बाद से बंगलादेश में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (ISI) की गतिविधियां कम हुई हैं, जो बंगलादेश के जरिये भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय विद्रोही संगठनों को मदद दे रही हैं। अब आई.एस.आई. अवामी लीग को अपदस्थ करने के लिए बीएनपी का साथ दे रही है।
बेगम खालिदा को त्रिपुरा से चकमा शरणार्थियों का स्वदेश वापस लौटना और चटगांव पहाड़ी क्षेत्र से फौज हटाने के शेख हसीना के फैसले पर आपत्ति है। उन्होंने साउदी अरब में जाकर शेख हसीना के बारे में कहा है कि वे बंगलादेश की इस्लामी संस्कृति नष्ट करने पर तुली हैं ताकि मुस्लिम भावनाओं का राजनीतिक फायदा उठाया जा सके।