१९९५ के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी है। आमतौर पर समझा जाता है कि नोबेल पुरस्कार पाने वाला व्यक्ति अवश्य ही कोई विशिष्ट प्रतिभा वाला होगा, क्योंकि ऐसी धारणा बन गयी है कि विश्व में अत्यन्त आदर और प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाने वाला यह पुरस्कार विश्व साहित्य की श्रेष्ठतम कृतियों को दिया जाता है।

संसार की उत्कृष्ट रचनाओं के अध्येता कमोबेश इस बात से अवगत हैं कि कई महान साहित्यकार ऐसे हुए हैं, जो अपनी लेखनी की बदौलत जन-जन के चितेरे बन गए, लेकिन नोबेल अकादमी के पोंगापंथी दृष्टिकोण में उनका सही मूल्यांकन नहीं हो पाया। साहित्य पढ़ने-जानने वालों को इस बात की जानकारी है कि अपने लेखन कौशल के चमत्कार से विश्व जनमानस पर छा जाने वाली तीन अति विशिष्ट विभूतियों को नोबेल पुरस्कार से वंचित कर दिया गया था। मगर उसके पीछे जो दकियानूसी विचारधारा काम कर रही थी, उसका विस्तृत विवरण पहली बार प्रकाश में आया है और इसका श्रेय भी नोबेल अकादमी के ही एक सदस्य को जाता है।

इस बेइंसाफी का शिकार होने वाले साहित्याकाश के ये तीनों जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं— **लेव तोल्सतोय, टॉमस हार्डी और ग्राहम ग्रीन**। लिखने-पढ़ने वाला शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसने इन तीनों का नाम न सुना हो। इनका नाम निर्णायकों ने प्रस्तावित करने के बाद अन्य व्यक्तियों को पुरस्कार दिए जाने की घोषणा कर दी।

लेव तोल्सतोय की जगह थियोडोर मॉमसेन को, टॉमस हार्डी की जगह पॉल हेइसे को और ग्राहम ग्रीन की जगह मिगुएल एंजेल अस्तूरियस को नोबेल पुरस्कार क्यों दिया गया? यह सवाल उठाया है नोबेल अकादमी के एक पूर्व सदस्य केजेल एस्पमार्क ने अपनी हाल में छपी पुस्तक *'नोबेल पुरस्कार के पीछे सिद्धान्त व मान्यताएं'* में। इसके जवाब में उन्होंने जो तथ्य उजागर किए हैं, उन्हें जानने के बाद व्यक्ति इस पुरस्कार के बारे में अब तक प्राप्त जानकारी पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो जाता है। उन्होंने जो ब्योरा दिया है, उसके बारे में संसार के बुद्धिजीवियों को पहले से बहुत कम जानकारी थी।

### पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता का इतिहास

एस्पमार्क स्वयं कवि, प्रखर आलोचक और साहित्यिक इतिहासवेत्ता हैं, जो नोबेल अकादमी के सदस्य भी रह चुके हैं। इतने सम्मानजनक अंतरराष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार का नीति-निर्धारण करने वाली संस्था के बारे में यह खेद का विषय है। रूढ़िवाद से आकंठ ग्रस्त इन निर्णायकों ने नोबेल पुरस्कार के संस्थापक और डायनामाइट के आविष्कर्ता अल्फ्रेड नोबेल की मूल भावनाओं की पूरी तरह अवहेलना कर दी। अल्फ्रेड नोबेल ने अपने वसीयतनामा में लिखा था कि सही अर्थों में सर्वोत्कृष्ट कृतियों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाए।

५८ वर्षों के बाद अकादमी का रिकॉर्ड जनसुलभ हो पाया है। इसलिए अब किसी भी जिज्ञासु के लिए यह जानना संभव हो गया है कि किन हालातों में अमुक व्यक्ति को पुरस्कार के लिए चुना गया और किन कारणों से किन्हीं का नाम निर्णायकों ने पुरस्कार की अंतिम सूची से निकाल दिया। रिकॉर्ड से पता चलता है कि निर्णायकों की नजर में टॉमस हार्डी के उपन्यासों की नायिकाओं में धार्मिक तथा नैतिक आदर्शों की कमी पायी गई और उसी वजह से हार्डी की जगह जर्मनी के लेखक पॉल हेइसे को अंतिम सूची में शामिल किया गया, जिनका नाम जर्मनी में भी लोग नहीं जानते थे।

फ्रांसीसी उपन्यासकार एमिल जोला को उनके विक्षिप्तता के स्तर तक प्रकृतिवादी रुझान वाला होने के कारण पुरस्कार से वंचित कर दिया गया। स्वीडन के महान लेखक ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग सारी जिंदगी अपने देश की राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्थाओं के खिलाफ लिखते रहे और उनके नाम पर कभी विचार तक नहीं किया गया।

केजेल एस्पमार्क का कहना है कि नोबेल अकादमी का इतिहास इसके अध्यक्ष तथा निर्णायक समिति के सदस्यों की अस्पष्ट आकांक्षाओं को थोपने की साजिशों से भरा है। उनके अनुसार तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक वातावरण के हिसाब से निर्णायकों के विचार बदलते रहे और इसका प्रभाव विश्व की इस एकमात्र सबसे बड़ी सम्मानित संस्था पर पड़े बिना न रह सका। जिन पुस्तकों की विषयवस्तु उनकी मानसिकता से मेल नहीं खायी, उनकी बिल्कुल उपेक्षा कर दी गयी। आरंभ के अधिकांश विजेताओं के नाम और शोहरत की दुनिया तो इतनी संकीर्ण थी कि साहित्यिक इतिहासकारों ने उनके नाम का कहीं जिक्र तक नहीं किया है। ऐसे रचनाकारों में से कुछ हैं— सली प्रुधोम, मॉरिस मेटरलिंक और हेनरी पोंतोपिदां। एस्पमार्क ने इसे अकादमी का दुर्भाग्य कहा है।

### सुधार का दौर और स्वर्णिम काल

१९२० के दशक में रूढ़िवादी सदस्यों के विरुद्ध अभियान शुरू हुआ और प्रगतिशील विचारों की नयी पीढ़ी के व्यक्तियों ने निर्णायकों की जगह ली। नए निर्णायक मण्डल ने अल्फ्रेड नोबेल की दिली इच्छा को भी उदारवादी पुट दिया। उन पर पूर्वाग्रह से ग्रसित लोग हावी नहीं हो पाए। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ और डब्ल्यू. बी. येट्स को पुरस्कार मिलना उसी का परिणाम था, जिनके नाम पहले के निर्णायक मण्डल ने अस्वीकृत कर दिए थे।

संस्था को और अधिक लोकप्रिय तथा उदार बनाने के लिए जॉन गाल्सवर्दी और पर्ल एस. बक को पुरस्कार दिए गए तथा *'गॉन विद द विंड'* की लेखिका मार्गरेट मिचेल का नाम भी सूची में शामिल किया गया।

दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति से पहले तक हरमन हेस्से, आंद्रे जीद, टी.एस. इलियट और विलियम फॉकनर के नामों पर विचार भी नहीं किया गया था; १९४६-४९ की अवधि में सर्वत्र इन्हीं की चर्चा थी। अकादमी के अन्दर नयी पीढ़ी आई तो सही, पर इसके आने में काफी देर हो चुकी थी, क्योंकि तब तक जेम्स जॉयस, फ्रांज काफ्का, डी.एच. लॉरेंस और मार्सेल प्राउस्ट सरीखे अद्वितीय महारथियों ने अपनी अंतिम यात्रा पूरी कर ली थी।

### पुनः असंगत तत्वों का प्रभाव

१९७० के दशक में अकादमी पर पुनः असंगत तत्वों का बोलबाला हो गया। नए सदस्यों की नयी नीति के अनुसार साहित्य समाज में हलचल मचाने वालों को पुरस्कार देने का विचार त्याग दिया गया और विविध भाषाओं, शैलियों और संस्कृतियों को सम्मानित किया जाने लगा।

अकादमी के एक प्रभावशाली सदस्य आर्थर लुंडक्विस्ट ने काफी जोर देकर कहा कि पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य उन प्रतिभाओं का सम्मान करना है जिन्हें अपेक्षित मान्यता नहीं मिली है। वही निर्णायक मण्डल का एकमात्र सदस्य था जिसने १९६७ में पाश्चात्य उपन्यास जगत में अपनी रचनाओं से सबसे लोकप्रिय माने जाने वाले लेखक ग्राहम ग्रीन के नाम का अंत तक विरोध किया। उस वर्ष का पुरस्कार ग्राहम ग्रीन की जगह ग्वाटेमाला के मिगुएल एंजेल अस्तूरियस को दिया गया।

तत्पश्चात् निर्णायकों की नीति-शैली में पुनः थोड़ा सा बदलाव आया। १९७३ में ऑस्ट्रेलिया के पैट्रिक व्हाइट और १९८६ में नाइजीरिया के वोले सोयिंका को पुरस्कार मिलने के बाद यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ गई। लेकिन १९०२ में लेव तोल्सतोय के स्थान पर एक फिसड्डी इतिहासकार को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कर तत्कालीन चयन समिति ने जो काला धब्बा लगा दिया, वह अकादमी के माथे पर से कभी नहीं मिट पाएगा।

तोल्सतोय जैसे कालजयी रचनाकार को नीचा दिखाकर पुरस्कार लेने वाले जर्मन रचनाकार थियोडोर मॉमसेन ने रोम के इतिहास पर एक पुस्तक लिखी थी और उसी के आधार पर घुन लगे मस्तिष्क वाले उस समय के निर्णायकों ने उन्हें जीवित इतिहासकारों में सबसे महान बताकर उनका नाम प्रस्तावित कर दिया। संसार भर में अकादमी की भारी फजीहत हुई और हाल के वर्षों में भी कुछ प्रस्तावित नामों को लेकर अकादमी की कटु आलोचना होती रही है।

### गोपनीयता और अप्रत्याशित निर्णय

अकादमी के सदस्य पुरस्कार की अंतिम सूची काफी गोपनीय रखते हैं, ताकि मनमाने ढंग से नामों का चयन कर संसार के बौद्धिक मंच पर अपनी इच्छा थोपी जा सके। प्रायः ऐसा होता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नाम जहां के तहां रह जाते हैं और किसी अजनबी को पुरस्कार देकर लोगों को चौंका दिया जाता है।

इस बार भी कुछ इसी से मिलती-जुलती बात सामने आई है। १९९५ के साहित्य नोबेल पुरस्कार विजेता सीमस हेनी के नाम की कहीं कोई चर्चा नहीं थी। ५६ वर्षीय सीमस हेनी आयरिश कवि हैं और उत्तरी आयरलैंड की आजादी के लिए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ कई वर्षों से संघर्षरत आई.आर.ए. (आयरिश रिपब्लिकन आर्मी) से जुड़े रहे हैं। पुरस्कार की सूचना पाने के बाद उन्होंने सिर्फ इतना कहा: *"जब मैं लिखता हूं तो लगता है एक किस्म का अपराध कर रहा हूं।"*

चाहे जो भी टीका-टिप्पणियां होती रही हों, पर इतना निर्विवाद सत्य है कि नोबेल अकादमी विश्व की एकमात्र संस्था है जहां से सम्मानित होने के बाद कोई भी रातोंरात विश्व-व्यक्तित्व बन जाता है। इसलिए अकादमी के एक पूर्व निदेशक बैरन रामेल की यह उक्ति सर्वथा सत्य है: **"नोबेल पुरस्कार बौद्धिकों का ओलंपिक स्वर्ण पदक है।"**