‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, अपितु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह अमर मंत्र रहा है जिसने दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए करोड़ों देशवासियों में असीम ऊर्जा और राष्ट्रीय चेतना का संचार किया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस अमर गीत के शब्दों में मातृभूमि के प्रति जो अगाध भक्ति और समर्पण व्यक्त हुआ है, वह आज भी प्रत्येक संवेदनशील भारतीय के हृदय को स्पंदित कर देता है।
किंतु अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वाधीनता के इतने दशकों के उपरांत भी इस पावन राष्ट्रीय उद्घोष को बारंबार राजनीतिक संकीर्णता, दलगत स्वार्थ और सांप्रदायिक चश्मे से देखने का कुत्सित प्रयास किया जाता रहा है। जब भी चुनाव निकट आते हैं, राजनीतिक मंचों पर ‘वंदे मातरम’ को लेकर निरर्थक और विभाजनकारी विवाद खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे देश के बुनियादी सवालों से ध्यान भटकाया जा सके।
संसद् से लेकर सड़कों तक इस प्रकार के विवाद राष्ट्रीय एकता और संविधान की मूल भावना को आघात पहुंचाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम राष्ट्रगीत की ऐतिहासिक गरिमा का सम्मान करें और इसे तुच्छ राजनीतिक नफा-नुकसान से परे रखकर संपूर्ण राष्ट्र के गौरव के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठापित रखें।