तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के आह्वान पर लाखों तिब्बतियों ने पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी चीनी आधिपत्य के खिलाफ शांतिपूर्ण संघर्ष छेड़ने की पूरी तैयारी कर ली है। तिब्बत के जन-प्रतिनिधि मंच "कशाग" की ओर से जारी एक वक्तव्य के मुताबिक इस बार का आंदोलन तब तक नहीं थमेगा जब तक कि "स्वशासन" का अधिकार न मिल जाए। लेकिन साथ में यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी भी हालत में वे हिंसा का सहारा नहीं लेंगे, भले ही राजधानी ल्हासा को चीन की लाल सेना तिब्बतियों के खून से क्यों न रंग दे।

पिछले वर्ष दिसंबर में प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा द्वारा रोम में गरीब देशों के सम्मेलन में चीनी प्रधानमंत्री ली फेंग से बातचीत के दौरान यह कहना कि भारत अपनी जमीन पर तिब्बती शरणार्थियों को चीन विरोधी गतिविधियों की इजाजत नहीं देगा, दलाई लामा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। वे इतना दुखी हुए कि उन्होंने तिब्बत की पूर्ण आजादी का ख्याल ही छोड़ दिया, क्योंकि भारत के समर्थन से ही यहां रह रहे तिब्बतियों का मनोबल काफी ऊंचा था। जो दलाई लामा पूरे विश्व में जगह-जगह घूम-घूम कर कहते फिर रहे थे कि तिब्बतियों का हमेशा से स्वतंत्र अस्तित्व रहा है, इसलिए उन्हें चीन का थोड़ा भी अंकुश कतई स्वीकार्य नहीं है, वही दलाई लामा भारतीय प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य के बाद से कह रहे हैं कि उनकी मंशा तिब्बत को चीन से अलग करना नहीं है; वे सिर्फ स्वशासन चाहते हैं जो आंतरिक स्वायत्तता तक ही सीमित होगा। अब जो उन्होंने नए आंदोलन की धमकी दी है, उसमें भारत से नैतिक समर्थन की भी उम्मीद नहीं कर रहे हैं।

आज इतने वर्ष बीत जाने के बावजूद प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किए गए नक्शे पर भारत की विदेश नीति चल रही है और इतिहास इस बात का साक्षी है कि तिब्बत के मामले में उनकी दूरदर्शी कूटनीति जारी है। पहले तो उन्होंने "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा दिया और अपनी मध्यस्थता में तिब्बत व चीनी नेताओं में समझौता कराने की कोशिश की, लेकिन चीन के नकारात्मक रुख से पं. नेहरू को बड़ी निराशा हुई। श्री देवगौड़ा के निमंत्रण पर चीन के राष्ट्रपति च्यांग चेमिन अभी हाल ही में भारत की यात्रा पर आए, लेकिन तिब्बत का जिक्र तक नहीं हुआ, जबकि भारत में रह रहे तिब्बती शरणार्थियों ने च्यांग चेमिन की यात्रा के दौरान प्रदर्शन करके भारत सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित किया था।

अपने भर दलाई लामा ने मुक्ति के लिए अंतर्राष्ट्रीय पृष्ठभूमि तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और चीन द्वारा हायतौबा मचाने के बावजूद न तो इनकी गतिविधियों में कमी आई है, न ही विश्व के विभिन्न हिस्सों से मिल रहे समर्थन में ही कोताही हो रही है।

तिब्बत की स्थिति की ओर यूरोपीय देशों का ध्यान आकर्षित करने के लिए श्री दलाई लामा का व्यापक यात्रा अभियान वास्तव में शुरू हुआ 1990 में, जब वे पहले अमेरिका और फिर ब्रिटेन गए। ब्रिटेन ने तो सिर्फ सहानुभूति दिखाई, लेकिन अमेरिका ने कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी दिखाई।

1996 में पूरे वर्ष में दलाई लामा ने यूरोप के कई चक्कर लगाए और उन्हें कुछ समर्थन भी मिला। दलाई लामा ने लगभग सभी शक्तिशाली देशों को यह आश्वस्त कराने की कोशिश की कि वे तिब्बत की निर्वासित सरकार के नेता हैं और यह एक स्वतंत्र सार्वभौम राष्ट्र है जिस पर जबरदस्ती कब्जा करके चीन अपना अटूट हिस्सा बताता है।

पिछले वर्ष मई में इस मामले को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर काफी शोर मचाया गया और अमेरिका तथा जर्मनी के समर्थन की बदौलत दो मानवाधिकार संगठनों - **"तिब्बत इंफॉर्मेशंस नेटवर्क"** और **"एशिया वॉच"** ने 52वें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के जेनेवा स्थित मुख्यालय द्वारा तिब्बत में चीनी आधिपत्य के खिलाफ प्रस्ताव पारित करवा दिया। उसके बाद 14 से 17 जून तक जर्मनी में तमाम तिब्बत समर्थक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने सम्मेलन आयोजित करके सभी जनतांत्रिक देशों से सीधे तौर पर हस्तक्षेप करने की अपील की। इस सम्मेलन की घोषणा मई के अंतिम सप्ताह में ही कर दी गई थी और घोषणा होते ही चीन ने जर्मनी से कहा कि वह अपने यहां आयोजन की अनुमति न दे, लेकिन जर्मन सरकार ने उस पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। बौखलाकर चीनी अधिकारियों ने पेइचिंग स्थित जर्मन दूतावास का कार्यालय बंद कर दिया और राजदूत को तत्काल चीन छोड़ देने का आदेश दिया। जर्मनी द्वारा भी बदले की कार्रवाई स्वाभाविक थी, पर उसके पूर्व ही चीन ने बॉन से अपने राजदूत को बुला लिया।

इस वर्ष ब्रिटेन भी शायद तिब्बत के प्रति उदारवादी रुख अपनाए, क्योंकि हांगकांग पर 1997 में ही ब्रिटेन का अधिकार समाप्त होने वाला है, जिससे ब्रिटेन के व्यापारिक हित जुड़े हैं।

चीन ने पिछले वर्ष छह वर्षीय शिशु गेदुन छोएकी नीमा को ल्हासा से रहस्यमय ढंग से गायब करवाकर तिब्बतियों का असंतोष और बढ़ा दिया, जिसे दलाई लामा ने अगला आध्यात्मिक नेता व पंचेन लामा बनाने के लिए चुना है। वैसे अंतर्राष्ट्रीय दबाव में आकर चीन के सरकारी पत्र **"पीपुल्स डेली"** ने स्पष्टीकरण दिया कि शिशु पंचेन लामा ल्हासा में ही एक मठ में सुरक्षित है, लेकिन तिब्बतियों को आशंका है कि चीन ने या तो पंचेन लामा की हत्या करवा दी है, अथवा करवाने की योजना है।

1997 को भी पिछले वर्ष की तरह तूफानी बनाने की तिब्बतियों की कोशिशों को चीन ने "साजिश" की संज्ञा दी है और सैनिक शिकंजा कसता जा रहा है। पंचेन लामा का मामला भी ठंडा नहीं पड़ा है। दलाई लामा पूर्ण आजादी की बात छोड़ अब स्वशासन पर भी समझौता करने को राजी हो गए हैं, लेकिन चीन उन्हें वह भी देने को तैयार नहीं है।