ग्यारह अप्रैल को ठीक पौ फटने के समय ईरान समर्थित कट्टरपंथी मुसलिम उग्रवादी संगठन हिजबुल्ला ने अपने लेबनान के ठिकाने से इजराइल की जमीन पर बेहद शक्तिशाली कत्युशा रॉकेटों से जबर्दस्त हमला किया। बड़ी संख्या में सैनिक और नागरिक मारे गए। इस हमले का जवाब इजराइल ने लेबनान के उन तमाम रिहाइशी इलाकों पर हवाई और नौसैनिक बमबारी से दिया, जहां हिजबुल्ला छापामारों के छुपे होने का अंदेशा था। फिर तो हमले और जवाबी हमले का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि सीरिया और अमेरिका के प्रयास से युद्धविराम का मसविदा न तैयार हो गया।
२१ अप्रैल को अमेरिकी विदेश मंत्री वारेन क्रिस्टोफर के नेतृत्व में फ्रांस, सीरिया और रूस के विदेश मंत्रियों ने दमिश्क में युद्धविराम का मसविदा बनाया और २७ अप्रैल को दोनों तरफ से हमले बंद हो गए। वैसे सही मायने में युद्धविराम लागू होने में काफी समय लगा क्योंकि जहां एक ओर क्रिस्टोफर और इजराइल के प्रधानमंत्री शिमोन पेरेज अपनी सफलता का ढिंढोरा पीट रहे थे, वहीं दूसरी ओर इजराइली बमवर्षकों व हिजबुल्ला रॉकेट लांचरों का काम जारी था।
मुख्य समस्या यह नहीं है क्योंकि लेबनान की जमीन से तब से इजराइल के खिलाफ अरब देश अपनी खुन्दक निकालते रहे हैं, जब १९४८ में समूचे पश्चिम एशिया के विरोध के बावजूद अमेरिका की बदौलत एक शक्तिशाली यहूदी देश इजराइल का उदय ठीक खाड़ी के बीचों-बीच हुआ। इजराइल उस जगह पर है जहां से उसे किसी भी अरब या खाड़ी के देश पर हमला करने में कोई दिक्कत नहीं होती है। और यही अमेरिका का मुख्य उद्देश्य भी था ताकि इजराइल के जरिये अरब देशों पर दबदबा बना रहे।
समस्या की जड़ का पता चलता है लेबनान के प्रधानमंत्री रफीक हरीरी के उस बयान से जो उन्होंने युद्धविराम के तुरन्त बाद जारी किया। उन्होंने कहा कि समस्या का असली और स्थायी हल एकमात्र यही है कि इजराइल हमारी एक-एक इंच जमीन खाली कर दे। इजराइल ने लेबनान के बहुत बड़े हिस्से पर १९६७ से ही कब्जा जमा रखा है। पिछले दो-तीन वर्षों में अमेरिका द्वारा फिलस्तीनियों को स्वशासन का अधिकार दिलाने के प्रयासों के दौरान इजराइल ने कुछ जमीन तो खाली की, लेकिन अभी भी 'सुरक्षा क्षेत्र' के नाम पर बहुत बड़ा भूभाग इजराइल के कब्जे में है। यहां बड़ी संख्या में इजराइल की फौज रहती है। इसके पीछे तर्क यह है कि कोई भी इसलामी उग्रवादी संगठन लेबनान के जरिये इजराइल के सुरक्षा ठिकानों पर हमला न करने पाए।
इजराइल की शक्ति के आगे लेबनान काफी कमजोर पड़ता है, इसलिए लेबनान की सरकार लड़कर अपनी जमीन खाली नहीं करवा सकती है। लेबनान की मजबूरी तमाम इसलामी देश समझते हैं, लेकिन इजराइल से सीधी लड़ाई मोल लेने की ताकत उनकी भी नहीं है। जब मिस्र जैसे ताकतवर देश को अपना इलाका इजराइल के कब्जे से मुक्त कराने में कई वर्ष लग गए तो बाकी देशों की क्या बिसात!सीरिया का गोलान हाइट्स पहाड़ी क्षेत्र तो अभी भी इजराइल के कब्जे में है, जबकि अब इजराइल से उसकी संधि भी हो चुकी है।
इधर इजराइल के मुख्य सरकारी प्रवक्ता यूरीडोरमी का कहना है कि अब अगर इसलामी कट्टरपंथियों ने यहूदियों के लिए कोई खतरा पैदा किया तो ईरान की स्थिति इराक वाली कर दी जाएगी। और उसकी शुरुआत ईरान के परमाणु ठिकाने पर बमबारी से होगी। उनके मुताबिक पहला बम तेहरान से १०० मील उत्तर पूर्व नेका परमाणु संयंत्र पर गिरेगा। यह वक्तव्य पश्चिमी देशों ने बिल्कुल सोची समझी नीति के तहत इजराइल से दिलवाया है, जिन्हें तेहरान की परमाणु हथियार बनाने की कोशिश पर घोर आपत्ति है। यूरीडोरमी ने साफ कहा है कि १९९१ में अगर इराक के हौसले पस्त नहीं किए जाते तो कई देशों की कुवैत वाली गत हो जाती, इसलिए ईरान को उस स्थिति में नहीं आने दिया जाएगा। उन्होंने दूसरे खाड़ी युद्ध की संभावना के बारे में स्पष्ट कुछ नहीं कहा जैसा कि लंदन के प्रमुख पत्र 'गार्जियन' में छापा है, लेकिन अंदर-अंदर अमेरिका ने फिर से पश्चिमी देशों को आपस में गोलबंद करना शुरू कर दिया है। इजराइल के प्रधानमंत्री शिमोन पेरेस को २७ अप्रैल की रात ही वाशिंगटन बुला लिया गया क्योंकि इजराइल भी कुवैत की तरह ही अमेरिका का प्रिय देश है। इजराइल ने जानबूझ कर लेबनान के रिहायशी इलाकों में यह कहकर बमबारी की कि चप्पे-चप्पे पर हिजबुल्ला के अड्डे हैं, ताकि लेबनान की सरकार इसलामी कट्टरपंथियों को अपने यहां से निकाल बाहर करे। इन हमलों में २०० से ज्यादा नागरिक मारे गए जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं हैं। लाखों लोग देश छोड़कर भाग गए लेकिन यह मानवाधिकार के उल्लंघन का मामला नहीं बना। कश्मीर में भारत द्वारा जेकेएलएफ के खिलाफ अपनाई जा रही नीति को मानवाधिकार का उल्लंघन बताने वाले अमेरिकी संगठनों ने एक बार भी इजराइल के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई।
२७ अप्रैल की रात हिजबुल्ला के सेक्रेट्री जनरल शेख हसन नसरल्लाह ने युद्धविराम का स्वागत तो किया, लेकिन साथ में यह बात भी स्पष्ट कर दी कि उनका संगठन तब तक अपना अभियान जारी रखेगा जब तक कि इजराइल के कब्जे से अरब देशों की सारी जमीन मुक्त नहीं हो जाती। इसमें दो राय नहीं कि अरब देशों की सहानुभूति हिजबुल्ला के साथ है क्योंकि इसे ईरान का समर्थन प्राप्त है जिसने कभी भी इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन जैसी धौंसपट्टी नहीं दिखाई। ईरान फिलस्तीनी मुक्ति संगठन के उग्रवादी गुट 'हमास' को भी समर्थन दे रहा है, जिसने पीएलओ अध्यक्ष यासर अरफात द्वारा इजराइल के साथ की गई शांति संधि को नहीं माना और इजराइल के खिलाफ छापामार युद्ध जारी रखा है। हमास के अखबार अलवतन के हवाले से लॉस एंजिलिस टाइम्स ने लिखा कि इजराइल ने अरफात के वे तेवर झाड़ दिए जिनको लेकर उन्होंने आज से ३० वर्ष पहले फिलस्तीन की आजादी के लिए जंग छेड़ी थी। इजराइल के दबाव में फिलस्तीन के संविधान से यह पंक्ति हटा ली गई कि इजराइल को नेस्तनाबूद करके उसी जमीन पर आजाद फिलस्तीन की स्थापना की जाएगी। इसके बाद यहूदी अधीनता स्वीकार कर लेने में क्या बाकी रह गया है। 'हमास' के मुताबिक फिलस्तीनियों को अपना वास्तविक हक इजराइल से मेल-मिलाप करके नहीं, उसी स्थिति में मिलेगा जब इजराइल को इसके लिए मजबूर कर दिया जाए। यों भी यासर अरफात फिलस्तीन के राष्ट्रपति जरूर हैं, लेकिन वास्तविक सत्ता इजराइल के प्रधानमंत्री के ही हाथ में है।
हिजबुल्ला ने इजराइल पर हमला कर अपनी हैसियत का परिचय दिया। उसी समय हिजबुल्ला ने इजराइल को अपनी ताकत का अहसास करा दिया, क्योंकि इजराइल के हर हमले का हिजबुल्ला के पास करारा जवाब था। काफी जद्दोजहद के बाद युद्धविराम लागू हो पाया था।
हिजबुल्ला उन कट्टरपंथियों का संगठन है, जिन्हें ईरान ने मुसलिम जगत को इजराइल के हाथों अपमानित होने से बचाने के लिए खड़ा किया है। इसका एक खतरनाक आत्मघाती दस्ता भी है जिसके चलते अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सरीखे देशों में हड़कंप मचा हुआ है। इसलिए अब उनमें अंदर ही अंदर इराक के बाद ईरान को नेस्तनाबूद करने की तैयारी चल रही है। हिजबुल्ला का लेबनान में अड्डा खाड़ी युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद बनना शुरू हो गया था।