बड़ी आशा और आकांक्षा से बना विश्व संगठन संयुक्त राष्ट्र घोर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहा है, यह खबर अब पुरानी पड़ चुकी है। अब खबर है कि यह पूरी तरह दिवालिया होने की स्थिति में है। और अगर इसमें सुधार लाने के तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो अब शायद किसी भी दिन सूचना मिले कि संयुक्त राष्ट्र के खजाने में अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। जाहिर है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के निर्वाह में लाचारी की इससे बड़ी वजह और क्या हो सकती है।

पूरे संसार को इस बात की फिक्र है। एशिया, अफ्रीका तथा पूर्वी यूरोप के देशों को कुछ ज्यादा ही चिंता है, जिनके पास अपने विकास कोष के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं हैं। हां, चिंता नहीं है तो अमेरिका को, जिससे संयुक्त राष्ट्र को विश्व में सबसे ज्यादा अनुदान मिलता है। अमेरिका अकेला देश है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी दादागिरी कायम रखने के लिए हमेशा संयुक्त राष्ट्र को हथकंडे के रूप में इस्तेमाल किया; बल्कि यों कहें कि अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय मामलों में निजी हितों से जुड़े अपने सारे निर्णयों का कार्यान्वयन विश्व संगठन के जरिए कराया, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के बजट की नकेल मुख्य रूप से अमेरिका के हाथ में है।

लेकिन पैसों और हथियार के घमंड में चूर इस देश को यह सोचने की जरूरत नहीं महसूस हो रही है कि उसके अपने ही फायदे के लिए सही, संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व में रहना जरूरी है। अमेरिका के पीछे-पीछे चलने वाले अन्य अनुदानदाता देश—फ्रांस, जापान, ब्रिटेन और रूस भी उसी की नीतियों पर चल रहे हैं। पिछले वर्ष के शुरू में ही संयुक्त राष्ट्र महासचिव बुतरस घाली ने अमेरिका और पश्चिम के अन्य बड़े देशों को वित्तीय संकट के बारे में चेताया था, लेकिन किसी ने उस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। घाली ने अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से अलग से मिलकर उनसे कम से कम अपना अंशदान 'अप-टू-डेट' कर देने का आग्रह किया। बिल क्लिंटन ने कूटनीतिक तरीके से घाली को तो कह दिया कि वे इस दिशा में जल्द ही ठोस कदम उठाएंगे, लेकिन थोड़े ही दिनों बाद सुझाव दे डाला कि संयुक्त राष्ट्र को अपने खर्च में कटौती करनी चाहिए और बस पल्ला झाड़ लिया।

यह कितनी शर्मनाक बात है कि विश्व के बहुत बड़े हिस्से पर घौंस दिखाने वाले गिने-चुने पश्चिमी देशों, जिसमें अब जापान भी शामिल हो गया है, ने पहले तो संयुक्त राष्ट्र को पंगु बनाकर रखने की सोची-समझी राजनीति चलाई और अब पूरी तरह से उसकी खटिया खड़ी करने का इंतजाम कर रहे हैं। इनके पास परमाणु परीक्षण के लिए और गरीब देशों को एक-दूसरे से लड़ाने के लिए पैसे की कमी नहीं है, लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में होने की चर्चा है, उस समय अमेरिका और फ्रांस ने चुप्पी साध रखी है, जिनके संयुक्त राष्ट्र को धता बताने वाले कारनामों की एक लंबी फेहरिस्त है।

आज हालत यह है कि इस विश्व संगठन के पास अपने विकास कार्यक्रमों और शांति मिशनों को चालू रखने के लिए कोष नहीं है। जैसा कि मुख्य वित्तीय अधिकारी जोसेफ कॉनर का कहना है कि अगर अनुदानदाता देशों का यह उपेक्षापूर्ण रवैया कायम रहा, तो अब वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न कार्यालयों में कार्यरत तकरीबन 54,000 कर्मचारियों को हर महीने तनख्वाह देने के लिए पैसे नहीं रहेंगे। यात्रा खर्चों पर कटौती पहले ही कर दी गई है। विशेष दूत अपवाद-स्वरूप ही कहीं-कहीं भेजे जा रहे हैं। शांति मिशन भी लगभग ठप्प होने की स्थिति में हैं, क्योंकि इस वर्ष मई दिवस के आयोजनों के लिए शांति मिशन के मद के लिए निर्धारित रकम (350 अरब डॉलर) में से लेकर देना पड़ा। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य तो यह है कि 1996 को संयुक्त राष्ट्र ने 'अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन वर्ष' घोषित कर दिया, लेकिन अर्थाभाव के कारण इस सिलसिले में कोई काम हो तो कैसे?

संयुक्त राष्ट्र के बजट का 25 प्रतिशत अमेरिका देता है, जिसके पास अनुदान का 1.6 अरब डॉलर बकाया है। दूसरा सबसे ज्यादा अनुदान देने वाला देश जापान है, जिसको मिलाकर बाकी अन्य सदस्य देशों के पास 3 अरब डॉलर बकाया है।

1945 में मात्र 50 देशों को लेकर स्थापित संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संख्या इस समय 185 है। स्थापना के समय कर्मचारियों की संख्या भी मात्र 150 थी, और आज 54,000 में से 14,000 तो सिर्फ न्यूयॉर्क स्थित सचिवालय में कार्यरत हैं। जब संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्षेत्र का बेहद विस्तार हो गया और ज्यादा कोष की जरूरत महसूस होने लगी, तब सदस्य देश अपने कर्तव्यपालन से भागने लगे। अमेरिका से बार-बार आग्रह करना घाली की मजबूरी है और इसलिए उन्होंने अमेरिका के कहे के मुताबिक काफी कुछ किया।

पिछले वर्ष अक्तूबर में जब संयुक्त राष्ट्र की 50वीं वर्षगांठ के सिलसिले में सदस्य देशों का जुटान हुआ, तो सभी देशों ने यह बात जरूर कही कि वे अपना अंशदान यथाशीघ्र देने की भरपूर कोशिश करेंगे ताकि नए वर्ष की शुरुआत अच्छी हो। लेकिन साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र के अंदर व्याप्त भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के बारे में भी चर्चा हुई, जिसके बारे में काफी समय से आवाज उठाई जा रही थी। महासचिव ने कहा कि कर्मचारियों को वेतन बहुत ही ज्यादा मिलते हैं, और उसके मुकाबले उनके पास काम कम है।

इतना ही नहीं, राजनीतिक नियुक्तियां पिछले कुछ वर्षों में धड़ल्ले से हुई हैं और इस सिलसिले में कोई खास कमी नहीं आई है। बुतरस घाली ने सम्मेलन, नीति-विश्लेषण, रात्रिकालीन कार्य, विकास कार्यक्रमों, सांख्यिकी और अन्य कई खर्चों में कटौती करके दिसंबर 1995 तक लगभग 30 मिलियन डॉलर की बचत की, लेकिन सदस्य देशों का वादा 1996 के पांच महीने गुजर जाने के बावजूद पूरा नहीं हो पा रहा है। वैसे जोसेफ कॉनर वित्तीय अनियमितता के आरोप का खंडन करते हैं और उनका कहना है कि मुख्य सचिवालय न्यूयॉर्क में जरूरत से कम कर्मचारी हैं।

संयुक्त राष्ट्र के नियमित सालाना बजट 4.7 अरब डॉलर को वे ज्यादा नहीं मानते, जो आश्चर्यजनक रूप से विश्व आय का मात्र 0.25 प्रतिशत होता है। कॉनर के मुताबिक अब अगर एक-दो महीने में सदस्य देशों ने अपना पिछला बकाया देकर भुगतान नियमित नहीं किया, तो इस वर्ष के अंत तक शांति मिशन के कोष से लेकर अन्य अत्यावश्यक मदों में लगाई जाने वाली राशि बढ़कर 400 मिलियन डॉलर हो जाएगी।