तिब्बत में जनतांत्रिक अधिकारों और पूर्ण आजादी के लिए 1990 से चल रहे आंदोलन ने इस वर्ष काफी जोर पकड़ लिया है। चीन की सरकार की बौखलाहट के लिए वैसे तो आंदोलन का लगातार जोर पकड़ते जाना पर्याप्त है, लेकिन उस स्थिति का क्या कहना जब इस आंदोलन को व्यापक अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिल रहा हो। तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा तो 1951 से ही अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उसी समय से चीन की सरकार तिब्बतियों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को टैंकों से कुचलती रही है, ठीक उसी तरह से जैसे चीन ने अपने ही देश के छात्र आंदोलन का त्यानान्मेन चौक पर दमन किया था।

1990 में जब दलाई लामा ने अपने यहां के जनप्रतिनिधियों के मंच 'कशाग' से हर प्रकार के अधिकारों की आवाज उठाई तो चीन के कान खड़े हो गये, क्योंकि दलाई लामा के जनतांत्रिक प्रयासों के लिए देश-विदेश से अनेकानेक शुभकामनाएं प्राप्त हुईं—खासकर अमरीका से और भी ज्यादा। तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने तो एक कदम आगे बढ़कर दलाई लामा को अपने यहां आने का निमंत्रण दे डाला, जो बात चीन को जरा भी अच्छी नहीं लगी।

दलाई लामा ने पहली बार खुलकर अपने यहां की जनता से कहा कि हमारे यहां की 'निर्वाचित सरकार' कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका बिल्कुल स्वतंत्र होनी चाहिए, जिसके लिए हमारा आंदोलन जारी रहेगा, लेकिन हमें अहिंसा का रास्ता कतई नहीं छोड़ना है। उसी समय से राष्ट्रव्यापी सभाओं, प्रदर्शनों तथा गोष्ठियों का सिलसिला शुरू हो गया। चीनी शासक यह कहकर तिब्बत को पूरी आजादी नहीं देना चाहते कि तिब्बत तो चीन का अटूट हिस्सा है, इसलिए इसे अलग से आजाद करने का सवाल ही बेतुका है। उनके मुताबिक चीन आजाद है, तो तिब्बत भी आजाद है और इस मामले में किसी देश की रुचि दिखाना चीन के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी मानी जाएगी। जबकि दलाई लामा अब पूरे संसार को यह बात बता चुके हैं कि 1950 तक तिब्बत एक आजाद देश था, जिसे चीन ने अपनी ताकत की बदौलत 1951 में गुलाम बना दिया।

चीन को अब शायद यह महसूस हो रहा है कि तिब्बत पर ज्यादा दिन कब्जा जमाये रखना संभव नहीं हो पायेगा, इसलिए सैनिक शिकंजा दिन-ब-दिन कसता जा रहा है, ताकि इसके पहले कि कहीं अमरीका, ताईवान जैसी स्थिति पैदा कर दे, पूरी तैयारी कर ली जाए। चीन की सतर्कता बढ़ी पिछले वर्ष, जब तिब्बत में पहली राजनीतिक पार्टी नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) का गठन हुआ। यह तिब्बत के चीनी आधिपत्य के बाद के इतिहास की पहली घटना थी जिसका पूरे प्रांत में हर्षोल्लास के साथ स्वागत किया गया और लगे हाथ इसकी युवा शाखा का भी गठन किया गया। वैसे पार्टी बनाने का श्रेय भी तिब्बती युवा कांग्रेस को ही है जिसे दलाई लामा का आशीर्वाद प्राप्त है।

इस पार्टी के अस्तित्व में आने और इसे मान्यता देने का परिणाम चीनी अधिकारी जानते थे, इसलिए इसकी प्रस्तावित रैली पर रोक लगा दी गयी, लेकिन मामला दबने के बजाए काबू से बाहर हो गया। चीनी शासकों द्वारा मान्यता न दिये जाने के बावजूद हाल में हुए तिब्बती पीपुल्स डिपुटीज के चुनाव में एनडीपी ने अपने उम्मीदवारों को खड़ा किया और सबके सब जीत गये। फिर मार्च में दलाई लामा द्वारा जनमत संग्रह की घोषणा ने आग में घी का काम किया, जिसके जवाब में चीनी अधिकारियों ने धरपकड़ अभियान शुरू किया और एक हजार से ज्यादा लोग अब तक विभिन्न जेलों में बंद किये जा चुके हैं।

दलाई लामा ने अपने यहां के नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा कि जनमत संग्रह कराकर हमें अपना भविष्य स्वयं तय करने का अधिकार दिया जाना चाहिए और उन्होंने मानवाधिकार उल्लंघन के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की ओर से पारित किये जाने वाले प्रस्ताव का भी जिक्र किया। पिछले वर्ष नवम्बर में चीनी अधिकारियों ने छह वर्षीय शिशु गेदुम गोएकयो नेईमा को रहस्यमय ढंग से गायब करवा दिया जिसे दलाई लामा ने तिब्बतियों के अगले आध्यात्मिक नेता और पंचेन लामा बनाने के लिए चुना था। पूरे तिब्बत में इस बात को लेकर बवेला मचा जिस पर काबू पाने में चीन अभी भी सफल नहीं हो पाया है। चीन ने अपनी सफाई में कहा है कि बच्चा ल्हासा में ही सुरक्षित है, लेकिन कहां है—यह जानकारी देने से इंकार कर दिया, जबकि रिपोर्ट है कि शिशु नेईमा को पेइचिंग में नजरबंद करके रखा गया है।

दो मानवाधिकार संगठनों—तिब्बत इंफॉर्मेशन नेटवर्क और एशिया वॉच ने इसे मुद्दा बनाया और अमरीकी समर्थन की बदौलत 52वें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के जेनेवा स्थित मुख्यालय द्वारा शीघ्र ही चीन के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने वाला है। चीन ने अपनी ओर से इस तरह का प्रस्ताव पारित न होने देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है, लेकिन उससे तिब्बतियों के प्रति अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति और बढ़ती जा रही है। अमरीकी और यूरोपीय समुदाय के रुख से साफतौर पर जाहिर हो चुका है कि इस प्रस्ताव को उनका भरपूर समर्थन मिलेगा। चीन को इस बीच तिब्बत के मामले में विश्व के शक्तिशाली देशों को आश्वस्त करने की कोशिश में बिल्कुल प्रतिकूल रुख का सामना करना पड़ रहा है जिससे चीनी शासक अपने को बड़ी असमंजस की स्थिति में पा रहे हैं। माहौल इतना बिगड़ चुका है कि तिब्बत में चल रहा दमनात्मक रवैया और कठोर करते भी नहीं बन रहा है।

जर्मनी में 14 से 17 जून तक आयोजित तिब्बत समर्थक संगठनों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के विरोध में चीन की बौखलाहट अपनी चरम सीमा पर पहुंच गयी। सम्मेलन की घोषणा होते ही चीन ने पेइचिंग स्थित जर्मन राजदूत को बुलाकर कड़े शब्दों में विरोध जाहिर किया और दूतावास कार्यालय बंद कर दिया। चीन ने जर्मन सरकार से कहा कि इस सम्मेलन का आयोजन करने वाले संगठन फ्रेडरिक नॉमेन फाउंडेशन पर प्रतिबंध लगा दे। इसके पूर्व मई के मध्य में दलाई लामा की यूरोप यात्रा के समय भी चीन ने ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क वगैरह को तिब्बती मामले में किसी प्रकार की दखलंदाजी न करने के संबंध में चेतावनी दी थी।

दूसरी ओर तिब्बत पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए चीन ने ल्हासा में अत्याधुनिक हथियारों का प्रशिक्षण देने का विशाल स्कूल खोला है। इस बीच पंचेन लामा का पता लगाने की कोशिश करने वाले दो भिक्षुओं को नजरबंद कर दिया गया। तिब्बत से ज्यादा चीनी अधिकारी ताईवान को लेकर परेशान हैं। ताईवान के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिश में चीनी शासकों ने इधर फ्रांस और जापान की यात्रा की। प्रधानमंत्री ली फंग मार्च में पेरिस गये और विदेश मंत्री छ्येन छीछन एक अप्रैल को टोक्यो पहुंचे। ली फंग की फ्रांस यात्रा ऐतिहासिक थी, क्योंकि कई वर्ष के बाद कोई चीनी प्रधानमंत्री अमरीका के बाद पश्चिम के दूसरे शक्तिशाली देश के दौरे पर गया था, लेकिन जाते ही जिस तरह के माहौल का सामना ली फंग को करना पड़ा कि उनकी यात्रा का मजा किरकिरा हो गया। फ्रांस के तकरीबन एक दर्जन मानवाधिकार और सामाजिक संगठनों ने पूरे देश में प्रदर्शन करके तिब्बत में अपनाई जा रही दमन नीति की आलोचना की और तिब्बतियों को तुरंत आजादी देने की मांग की।

ताईवान की ही तरह चीन को तिब्बत के मामले में भी सबसे ज्यादा खतरा अमरीका से है, जो शुरू से ही दलाई लामा का साथ दे रहा है। भारत की स्थिति इसमें सबसे दयनीय है जो चाहकर भी दलाई लामा की मदद नहीं कर सकता, जबकि लाखों की संख्या में तिब्बती यहां शरणार्थियों की जिन्दगी जी रहे हैं और आज से नहीं, 1951 से ही, जब भारत तिब्बत पर चीनी आक्रमण के समय मूक दर्शक बना रहा। इस भूल से भारत अपने को कभी बरी नहीं कर सकता। दलाई लामा उसी समय से भारत में निर्वासित जिन्दगी जी रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि जिस देश ने पंडित नेहरू के नेतृत्व में विश्वशांति का बिगुल बजाया, वो आज शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहे बौद्धों के समर्थन में कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है कि चीन से टकराव न मोल लेना पड़ जाए। और यही भारत है जिसने 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ सेना भेजकर बांग्लादेश को आजाद कराया।